ॐDIVYORATHE BHAGAVAD GITA

अध्याय 1 / 18

अर्जुन विषाद योग

अर्जुनविषादयोग — अर्जुन का विषाद

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जहाँ एक महान योद्धा टूट जाता है — और वहीं से गीता शुरू होती है।

श्लोक 1

धृतराष्ट्र

धृतराष्ट्र उवाच। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १ ॥

dhṛtarāṣṭra uvāca | dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ | māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya || 1 ||

  • धर्मक्षेत्रे — धर्म की भूमि में
  • कुरुक्षेत्रे — कुरुक्षेत्र में
  • समवेताः — एकत्र हुए
  • युयुत्सवः — युद्ध की इच्छा वाले
  • मामकाः — मेरे पुत्र
  • पाण्डवाः — पाण्डु के पुत्र
  • किम् अकुर्वत — क्या किया
  • सञ्जय — हे संजय

धृतराष्ट्र ने कहा — हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

कल्पना कीजिए — एक अंधा राजा अपने महल में बैठा है। युद्ध कोसों दूर हो रहा है, और वह देख नहीं सकता। उसके पास केवल एक सहारा है — संजय की आवाज़। और पूरे महाभारत में उसका पहला प्रश्न क्या है? — मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? इस एक शब्द को सुनिए — मामकाः। मेरे। सौ पुत्र ‘मेरे’ हैं, और पाँच ‘पाण्डु के’। एक ही कुल। एक ही रक्त। पर एक शब्द में बँट गया। युद्ध मैदान पर नहीं, उस शब्द में शुरू हो चुका था।

अंधा राजा, और संजय की आवाज़

जहाँ ‘मेरा’ और ‘पराया’ का भेद खड़ा हो जाता है, वहीं हर युद्ध का बीज पड़ जाता है।

श्लोक 2

संजय

सञ्जय उवाच। दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ २ ॥

sañjaya uvāca | dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṁ vyūḍhaṁ duryodhanastadā | ācāryamupasaṁgamya rājā vacanamabravīt || 2 ||

  • दृष्ट्वा — देखकर
  • पाण्डव-अनीकम् — पाण्डवों की सेना को
  • व्यूढम् — व्यूह में खड़ी
  • दुर्योधनः — दुर्योधन ने
  • तदा — उस समय
  • आचार्यम् उपसंगम्य — आचार्य के पास जाकर
  • राजा — राजा ने
  • वचनम् अब्रवीत् — ये वचन कहे

संजय ने कहा — उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की व्यूह-रचना में खड़ी सेना को देखकर, अपने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।

कल्पना कीजिए — दुर्योधन मैदान पर खड़ा है। उसकी सेना बड़ी है। ग्यारह अक्षौहिणी, और सामने केवल सात। गिनती में वह जीत रहा है। फिर भी उसके पैर उसे किसकी ओर ले जाते हैं? सेनापति भीष्म की ओर नहीं — अपने आचार्य की ओर। और वह बिना पूछे बोलने लगता है। संजय ने उसे ‘राजा’ कहा। पर उस राजा के भीतर उस क्षण एक डरा हुआ शिष्य खड़ा था। जिसके पास शक्ति हो पर शांति न हो — वह सबसे पहले बोलने लगता है।

ग्यारह अक्षौहिणी — और फिर भी बेचैनी

बाहर की गिनती जीत नहीं देती। जो भीतर से अशांत है, वह पूरी सेना के बीच भी अकेला है।

श्लोक 3

दुर्योधन

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥ ३ ॥

paśyaitāṁ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṁ camūm | vyūḍhāṁ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā || 3 ||

  • पश्य — देखिए
  • एताम् — इस
  • पाण्डुपुत्राणाम् — पाण्डु के पुत्रों की
  • आचार्य — हे आचार्य
  • महतीम् चमूम् — विशाल सेना को
  • व्यूढाम् — व्यूह में खड़ी
  • द्रुपदपुत्रेण — द्रुपद के पुत्र द्वारा
  • तव शिष्येण — आपके शिष्य द्वारा
  • धीमता — बुद्धिमान

हे आचार्य! पाण्डु-पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य — द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न — ने व्यूह के रूप में खड़ा किया है।

कल्पना कीजिए — एक शिष्य अपने गुरु के पास आता है और कहता है — देखिए। यह 'देखिए' आदर नहीं, आदेश है। और उसके बाद जो शब्द आता है, वही असली चोट है — तव शिष्येण। आपके शिष्य ने। सामने की सेना जिस व्यूह में खड़ी है, वह रचना द्रोण ने ही सिखाई थी। दुर्योधन गुरु को युद्ध नहीं समझा रहा — उन्हें उनकी अपनी लज्जा याद दिला रहा है, ताकि वे कठोर होकर लड़ें। जिसे अपने सेनापति पर भरोसा हो, उसे ताना मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

आचार्य के सम्मुख खड़ा दुर्योधन

जो अपनों को उकसाकर काम कराता है, वह भरोसा नहीं — डर बाँट रहा होता है।

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