धृतराष्ट्र ने कहा — हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
कल्पना कीजिए — एक अंधा राजा अपने महल में बैठा है। युद्ध कोसों दूर हो रहा है, और वह देख नहीं सकता। उसके पास केवल एक सहारा है — संजय की आवाज़।
और पूरे महाभारत में उसका पहला प्रश्न क्या है? — मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
इस एक शब्द को सुनिए — मामकाः। मेरे। सौ पुत्र ‘मेरे’ हैं, और पाँच ‘पाण्डु के’। एक ही कुल। एक ही रक्त। पर एक शब्द में बँट गया।
युद्ध मैदान पर नहीं, उस शब्द में शुरू हो चुका था।
अंधा राजा, और संजय की आवाज़
जहाँ ‘मेरा’ और ‘पराया’ का भेद खड़ा हो जाता है, वहीं हर युद्ध का बीज पड़ जाता है।
श्लोक 2
संजय
सञ्जय उवाच।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ २ ॥
संजय ने कहा — उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की व्यूह-रचना में खड़ी सेना को देखकर, अपने आचार्य द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।
कल्पना कीजिए — दुर्योधन मैदान पर खड़ा है। उसकी सेना बड़ी है। ग्यारह अक्षौहिणी, और सामने केवल सात। गिनती में वह जीत रहा है।
फिर भी उसके पैर उसे किसकी ओर ले जाते हैं? सेनापति भीष्म की ओर नहीं — अपने आचार्य की ओर। और वह बिना पूछे बोलने लगता है।
संजय ने उसे ‘राजा’ कहा। पर उस राजा के भीतर उस क्षण एक डरा हुआ शिष्य खड़ा था।
जिसके पास शक्ति हो पर शांति न हो — वह सबसे पहले बोलने लगता है।
ग्यारह अक्षौहिणी — और फिर भी बेचैनी
बाहर की गिनती जीत नहीं देती। जो भीतर से अशांत है, वह पूरी सेना के बीच भी अकेला है।
हे आचार्य! पाण्डु-पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य — द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न — ने व्यूह के रूप में खड़ा किया है।
कल्पना कीजिए — एक शिष्य अपने गुरु के पास आता है और कहता है — देखिए।
यह 'देखिए' आदर नहीं, आदेश है। और उसके बाद जो शब्द आता है, वही असली चोट है — तव शिष्येण। आपके शिष्य ने। सामने की सेना जिस व्यूह में खड़ी है, वह रचना द्रोण ने ही सिखाई थी।
दुर्योधन गुरु को युद्ध नहीं समझा रहा — उन्हें उनकी अपनी लज्जा याद दिला रहा है, ताकि वे कठोर होकर लड़ें।
जिसे अपने सेनापति पर भरोसा हो, उसे ताना मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
आचार्य के सम्मुख खड़ा दुर्योधन
जो अपनों को उकसाकर काम कराता है, वह भरोसा नहीं — डर बाँट रहा होता है।
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