अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् — आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले
विषीदन्तम् — शोक करते हुए
इदम् वाक्यम् — यह वचन
उवाच — कहा
मधुसूदनः — मधुसूदन ने
संजय ने कहा — करुणा से भरे हुए, आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले और शोक करते हुए उस अर्जुन से मधुसूदन ने यह वचन कहा।
कल्पना कीजिए — दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, शंख बज चुके हैं, और ठीक बीच में एक रथ रुका हुआ है।
रथ पर बैठा धनुर्धर काँप रहा है। उसकी आँखें आँसुओं से इतनी भरी हैं कि सामने कुछ साफ़ नहीं दिखता — अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
और संजय इस क्षण में कृष्ण को किस नाम से पुकारता है? मधुसूदन। मधु नामक दैत्य को मारने वाले।
जो हाथ धनुष नहीं उठा पा रहा, उसके सामने खड़े हैं — मधुसूदन।
नाम भी कभी-कभी संकेत होता है।
आँसुओं से भरा रथ
हमारा संकट जिस क्षण सबसे गहरा होता है, उसी क्षण सहारा भी सबसे पास खड़ा होता है — बस हमारी आँखें आँसुओं से भरी होती हैं।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥ २ ॥
श्रीभगवान ने कहा — हे अर्जुन! इस विषम घड़ी में तुझे यह मोह कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं, न स्वर्ग देने वाला है और न कीर्ति देने वाला।
कल्पना कीजिए — शिष्य रो रहा है, और गुरु उसे तुरंत सांत्वना नहीं देता।
कृष्ण का पहला वाक्य उपदेश नहीं है। वे पूछते हैं — कुतः? यह कायरता आई कहाँ से? और वह भी विषमे — ठीक इसी कठिन घड़ी में?
गीता का पहला उपदेश उपदेश नहीं — एक प्रश्न है।
क्योंकि जो अपनी कमज़ोरी का स्रोत नहीं जानता, वह उसे हटा भी नहीं सकता। कृष्ण पहले जड़ दिखाते हैं, दवा बाद में देते हैं।
विषम घड़ी का प्रश्न
जब मन डगमगाए, तो पहला काम उत्तर ढूँढ़ना नहीं — यह पूछना है कि यह कमज़ोरी आई कहाँ से।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥ ३ ॥
हे पार्थ! कायरता को मत प्राप्त हो, यह तुझे शोभा नहीं देता। हे परन्तप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर उठ खड़ा हो।
कल्पना कीजिए — अर्जुन को लग रहा है कि उसका दुःख संसार का सबसे बड़ा दुःख है। कुल का नाश, गुरुओं की मृत्यु, धर्म का प्रश्न।
और कृष्ण उस पूरे बोझ को एक शब्द में तौल देते हैं — क्षुद्रम्। तुच्छ। हृदय की एक दुर्बलता, इससे अधिक कुछ नहीं।
जिस दुःख को अर्जुन पहाड़ समझ रहा था, कृष्ण ने उसे एक शब्द दिया — क्षुद्र।
और फिर केवल एक आदेश — उत्तिष्ठ। उठ।
नाम बदलते ही बोझ का वज़न बदल जाता है।
उठ, खड़ा हो
कभी-कभी हमारा सबसे बड़ा बोझ केवल इसलिए बड़ा है क्योंकि हमने उसे कभी छोटे नाम से पुकारा ही नहीं।
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