अर्जुन ने कहा — हे जनार्दन, यदि आपके मत में कर्म से बुद्धि श्रेष्ठ है, तो फिर हे केशव, आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगा रहे हैं?
रथ पर अर्जुन धनुष गोद में रखे बैठा है। कृष्ण की पिछली बातें उसके मन में घूम रही हैं — स्थिर बुद्धि, समता, इच्छाओं से मुक्ति।
उसे इन बातों में एक रास्ता दिखता है। अगर बुद्धि ही सबसे ऊँची है, तो फिर बाण चलाने की क्या ज़रूरत?
वह सीधे पूछता है, थोड़ी शिकायत के साथ। अगर सोचना ही श्रेष्ठ है, तो आप मुझे मारने-काटने में क्यों धकेल रहे हैं?
यह प्रश्न हम सबका है। जब कोई कठिन काम सामने हो, तो मन बड़े सुंदर तर्क खोज लाता है — उससे बचने के लिए।
अर्जुन का प्रश्न
कठिन काम से बचने के लिए मन अक्सर ऊँचे विचारों का सहारा ले लेता है।
vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me |
tadekaṁ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyām || 2 ||
व्यामिश्रेण इव — मिले-जुले से
वाक्येन — वचनों से
बुद्धिं मोहयसि इव — बुद्धि को मानो उलझा रहे हो
मे — मेरी
तत् एकम् — इसलिए एक बात
वद निश्चित्य — निश्चय करके कहो
येन — जिससे
श्रेयः — कल्याण
अहम् आप्नुयाम् — मैं पा सकूँ
आप अपनी मिली-जुली सी बातों से मानो मेरी बुद्धि को उलझा रहे हैं। इसलिए निश्चय करके मुझे वह एक बात बताइए, जिससे मैं कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
कल्पना कीजिए — एक विद्यार्थी दो सलाहें लेकर बैठा है। एक कहती है इंजीनियरिंग, दूसरी कहती है संगीत। दोनों सही लगती हैं, और इसीलिए वह कुछ भी नहीं चुन पाता।
अर्जुन की हालत यही है। कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की और कर्म की भी। उसे लगता है दोनों एक-दूसरे को काट रही हैं।
वह थका हुआ है। उसे अब और तर्क नहीं, एक पक्का उत्तर चाहिए।
मुझे दस बातें नहीं चाहिए, बस वह एक बात बताइए जिस पर मैं चल सकूँ।
एक निश्चित उत्तर
उलझन में सबसे पहले एक साफ़ प्रश्न चाहिए — मुझे क्या करना है, और क्यों।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥ ३ ॥
श्रीभगवान ने कहा — हे निष्पाप अर्जुन, इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कही है — ज्ञानमार्गियों की निष्ठा ज्ञानयोग से, और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से।
कृष्ण मुस्कुराते हैं। अर्जुन को लगा था कि उसे दो रास्तों में से एक चुनना है — एक सही, एक गलत।
कृष्ण बताते हैं कि रास्ते दो हैं, पर दोनों सच्चे हैं। कोई स्वभाव से चिंतन की ओर झुकता है, कोई करने की ओर।
जैसे एक अस्पताल में कोई डॉक्टर प्रयोगशाला में शोध करता है, और कोई वार्ड में रात भर मरीज़ों के बीच दौड़ता है। दोनों एक ही बीमारी से लड़ रहे हैं।
प्रश्न यह नहीं कि कौन-सा रास्ता ऊँचा है, प्रश्न यह है कि तेरा रास्ता कौन-सा है।
दो निष्ठाएँ
ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं हैं — अलग स्वभावों के लिए दो सच्चे रास्ते हैं।
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