ॐDIVYORATHE BHAGAVAD GITA

अध्याय 4 / 18

ज्ञान कर्म संन्यास योग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — ज्ञान और कर्म का संन्यास

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ईश्वर बार-बार अवतार क्यों लेते हैं।

श्लोक 1

श्रीकृष्ण

श्रीभगवानुवाच। इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca | imaṁ vivasvate yogaṁ proktavānahamavyayam | vivasvān manave prāha manurikṣvākave'bravīt || 1 ||

  • इमम् — इस
  • विवस्वते — सूर्यदेव विवस्वान को
  • योगम् — योग को
  • प्रोक्तवान् अहम् — मैंने कहा था
  • अव्ययम् — अविनाशी
  • मनवे — मनु को
  • प्राह — कहा
  • इक्ष्वाकवे — राजा इक्ष्वाकु को
  • अब्रवीत् — बताया

श्रीभगवान ने कहा — यह अविनाशी योग मैंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को सिखाया था। विवस्वान ने इसे मनु को बताया, और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को सौंपा।

युद्धभूमि के बीच, रथ पर खड़े कृष्ण अचानक समय को बहुत पीछे ले जाते हैं। इतना पीछे, जब सूरज की पहली किरण धरती पर पड़ी थी। वे कहते हैं — जो बात मैं तुझे अभी बता रहा हूँ, वह नई नहीं है। यह मैंने सबसे पहले सूर्य को दी थी। सूर्य से मनु तक, मनु से इक्ष्वाकु तक — यह ज्ञान एक हाथ से दूसरे हाथ में दीपक की तरह गया। जैसे दादी की कोई विधि माँ से होकर बेटी तक पहुँचती है — बिना किसी किताब के, पर पूरी सच्चाई के साथ।

सूर्य से मनु तक

गीता का ज्ञान कोई नया विचार नहीं — यह सृष्टि के आरंभ से चली आ रही परंपरा है।

श्लोक 2

श्रीकृष्ण

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥ २ ॥

evaṁ paramparāprāptamimaṁ rājarṣayo viduḥ | sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa || 2 ||

  • एवम् — इस प्रकार
  • परम्पराप्राप्तम् — परंपरा से मिले
  • इमम् — इस योग को
  • राजर्षयः — राजर्षियों ने
  • विदुः — जाना
  • कालेन महता — बहुत लंबे समय से
  • इह — इस संसार में
  • योगः नष्टः — योग लुप्त हो गया
  • परन्तप — हे परन्तप

इस प्रकार गुरु-शिष्य परंपरा से मिले इस योग को राजर्षियों ने जाना। किंतु हे परन्तप, बहुत लंबा समय बीत जाने से यह योग इस संसार में लुप्त हो गया।

किसी पुराने घर की अलमारी में एक डायरी मिलती है — परदादा की लिखी हुई। पन्ने पीले हैं, स्याही उड़ चुकी है, कुछ शब्द पढ़े ही नहीं जाते। कृष्ण इस ज्ञान के साथ भी यही होते देखते हैं। पहले राजा भी ऋषि होते थे — वे राज चलाते थे और यह योग जीते थे। फिर पीढ़ियाँ बदलीं। शब्द बचे रहे, पर उन्हें जीने वाले कम होते गए। ज्ञान किताब में नहीं मरता — वह तब खोता है जब उसे जीने वाला कोई नहीं रहता।

राजर्षियों की परंपरा

ज्ञान तभी जीवित रहता है जब कोई उसे अपने जीवन में उतारे — केवल याद रखने से वह धीरे-धीरे खो जाता है।

श्लोक 3

श्रीकृष्ण

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ ३ ॥

sa evāyaṁ mayā te'dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ | bhakto'si me sakhā ceti rahasyaṁ hyetaduttamam || 3 ||

  • सः एव अयम् — वही यह
  • मया — मेरे द्वारा
  • ते — तुझसे
  • अद्य — आज
  • पुरातनः — प्राचीन
  • भक्तः असि — तू भक्त है
  • सखा — मित्र
  • रहस्यम् — रहस्य
  • उत्तमम् — उत्तम

वही प्राचीन योग आज मैंने तुझसे कहा है, क्योंकि तू मेरा भक्त है और मेरा सखा भी है। यह योग सचमुच एक उत्तम रहस्य है, जिसे हर किसी से नहीं कहा जाता।

रथ पर कृष्ण की आवाज़ धीमी हो जाती है, जैसे कोई बहुत निजी बात कहने जा रहा हो। वे कहते हैं — सदियों से खोया वह ज्ञान मैं आज तुझे क्यों दे रहा हूँ? क्योंकि तू मुझसे प्रेम करता है, और तू मेरा सखा है। सोचिए, कोई गुरु अपनी सबसे क़ीमती बात किसी परीक्षा में अव्वल आने वाले को नहीं, अपने सबसे भरोसेमंद साथी को सौंपता है। गीता का द्वार बुद्धि से नहीं, रिश्ते से खुलता है।

भक्त और सखा

सबसे गहरा ज्ञान उसी को मिलता है जो प्रेम और भरोसे के साथ उसके पास आता है।

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