अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण, आप एक ओर कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वही मुझे पक्का करके बताइए।
रथ पर अर्जुन का माथा सिकुड़ा हुआ है। अभी-अभी उसने सुना कि ज्ञान की आग में सारे कर्म भस्म हो जाते हैं। उससे पहले सुना था कि कर्म किए बिना कोई एक क्षण भी नहीं रह सकता।
वह उस विद्यार्थी जैसा है जिसे दो शिक्षक दो सलाहें दे गए हों — एक कहे सब छोड़कर पढ़ाई कर, दूसरा कहे नौकरी भी करता रह।
अर्जुन को अब लंबी व्याख्या नहीं, बस एक पक्का उत्तर चाहिए।
यह प्रश्न एक थके हुए मन का प्रश्न है, जो अब और नहीं उलझना चाहता।
अर्जुन का निर्णायक प्रश्न
जब मन दो अच्छे रास्तों के बीच फँस जाए, तो साफ़ कहना कि मुझे एक पक्का उत्तर चाहिए, कमज़ोरी नहीं है।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ २ ॥
श्रीभगवान ने कहा — कर्मों का संन्यास और कर्मयोग, ये दोनों ही परम कल्याण तक ले जाते हैं। परंतु इन दोनों में कर्मों के संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।
कृष्ण किसी रास्ते को छोटा नहीं करते। पहले ही वाक्य में वे दोनों को सम्मान देते हैं — दोनों पहुँचाते हैं।
पर फिर वे तराज़ू को धीरे से एक ओर झुका देते हैं। करते हुए छूटना, छोड़कर बैठने से श्रेष्ठ है।
उस स्त्री को देखिए जो दफ़्तर, घर और बीमार पिता — तीनों सँभालती है। उसने कुछ नहीं छोड़ा, फिर भी भीतर से वह किसी चीज़ से चिपकी नहीं है।
अर्जुन के लिए संकेत साफ़ है। धनुष नीचे रखने से मुक्ति नहीं मिलेगी। धनुष उठाकर भी भीतर से मुक्त रहा जा सकता है।
कर्मयोग श्रेष्ठ है
दोनों रास्ते पहुँचाते हैं, पर काम छोड़े बिना भीतर से छूट जाना अधिक सच्चा और सरल मार्ग है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ ३ ॥
jñeyaḥ sa nityasaṁnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvandvo hi mahābāho sukhaṁ bandhātpramucyate || 3 ||
ज्ञेयः — जानना चाहिए
सः नित्यसंन्यासी — वह सदा का संन्यासी
यः न द्वेष्टि — जो द्वेष नहीं करता
न काङ्क्षति — न कामना करता है
निर्द्वन्द्वः हि — क्योंकि द्वंद्वों से रहित
महाबाहो — हे महाबाहु
सुखम् — सहज ही
बन्धात् प्रमुच्यते — बंधन से छूट जाता है
हे महाबाहु, जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी चीज़ की कामना करता है, उसे सदा का संन्यासी ही जानना चाहिए। क्योंकि राग और द्वेष के द्वंद्वों से मुक्त ऐसा मनुष्य सहज ही बंधन से छूट जाता है।
संन्यासी कौन है? कृष्ण इसका उत्तर गेरुए वस्त्रों में नहीं, मन के भीतर खोजते हैं।
मोहल्ले के एक दुकानदार को देखिए। सुबह शटर उठाता है। कोई ग्राहक मोलभाव करता है, कोई बिना कुछ लिए लौट जाता है। वह न किसी पर चिढ़ता है, न किसी बड़े सौदे के लिए तड़पता है।
वह दुकान में बैठा है, फिर भी संन्यासी है।
पसंद और नापसंद — यही दो रस्सियाँ हैं जो हमें बाँधती हैं। दोनों ढीली पड़ जाएँ, तो छूटने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता।
सदा का संन्यासी
संन्यास कपड़ों का नहीं, मन का होता है — जहाँ न किसी से चिढ़ है, न किसी चीज़ की तड़प।
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