प्रथम 3 श्लोक की मुफ्त झलक · पूरा अध्याय आने वाले ऐप में
मन को साधने की विधि — ध्यान।
श्लोक 1
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ १ ॥
śrībhagavānuvāca |
anāśritaḥ karmaphalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ |
sa saṁnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ || 1 ||
अनाश्रितः — आश्रय न लेकर
कर्मफलम् — कर्म के फल का
कार्यम् कर्म — करने योग्य कर्म
करोति यः — जो करता है
सः संन्यासी च योगी च — वही संन्यासी और योगी है
न निरग्निः — अग्नि छोड़ने वाला नहीं
न च अक्रियः — न ही कर्म छोड़ने वाला
श्रीभगवान ने कहा — जो मनुष्य कर्म के फल का सहारा लिए बिना वह कर्म करता है जो करने योग्य है, वही संन्यासी है और वही योगी है। केवल यज्ञ की अग्नि छोड़ देने वाला या सारे काम छोड़ देने वाला संन्यासी नहीं होता।
कल्पना कीजिए — एक व्यक्ति रोज़ सुबह अपनी बीमार माँ के लिए दवा लाता है, दफ़्तर जाता है, शाम को बच्चों का होमवर्क देखता है। उसने कभी गेरुआ नहीं पहना।
और एक दूसरा व्यक्ति है जिसने घर छोड़ दिया, पर भीतर हर पल हिसाब चल रहा है — मुझे इससे क्या मिलेगा।
कृष्ण रथ पर अर्जुन की ओर मुड़ते हैं और संन्यास की परिभाषा ही बदल देते हैं। संन्यास कपड़ों में नहीं, फल की पकड़ छोड़ने में है।
जो करना है, वह पूरे मन से होता रहे — और परिणाम सहारा न बने।
सच्चा संन्यासी कौन
संन्यासी वह नहीं जिसने काम छोड़ा, बल्कि वह है जिसने काम के फल की पकड़ छोड़ी।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥ २ ॥
हे पाण्डव, जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान। क्योंकि जिसने अपने मन के संकल्पों को, यानी फल की योजनाओं को नहीं छोड़ा, वह कोई भी योगी नहीं बन सकता।
संकल्प का अर्थ यहाँ है — मन में चलती वह योजना कि ऐसा हो तो मैं सुखी, वैसा हो तो दुखी।
रात को सोने से पहले ध्यान दीजिए। मन अगले दिन की बातचीत पहले से लिख रहा होता है — वह यह कहेगा, तो मैं यह कहूँगा।
कृष्ण कहते हैं, संन्यास और योग दो अलग रास्ते नहीं हैं। दोनों एक ही दरवाज़े से गुज़रते हैं। जब तक भीतर यह योजना बनती रहती है, तब तक आसन पर बैठकर भी मन बाज़ार में ही घूमता है।
छोड़ना बाहर से नहीं, इसी भीतर की पटकथा से शुरू होता है।
संन्यास ही योग है
जिसने मन की 'ऐसा हो तो सुखी' वाली योजनाएँ नहीं छोड़ीं, वह न संन्यासी है न योगी।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ ३ ॥
जो मुनि योग की ऊँचाई पर चढ़ना चाहता है, उसके लिए निष्काम कर्म ही साधन कहा गया है। और जब वही व्यक्ति योग पर आरूढ़ हो जाता है, तब उसके लिए शम, यानी मन की शांति, साधन कही गई है।
एक पहाड़ी मंदिर की कल्पना कीजिए। नीचे से ऊपर तक पत्थर की सैकड़ों सीढ़ियाँ हैं।
चढ़ते समय पैर चलाने पड़ते हैं, साँस फूलती है, पसीना आता है। यही कर्म है — सेवा, कर्तव्य, बिना फल माँगे किया गया काम।
पर जब आप ऊपर पहुँच जाते हैं, तो फिर चलना नहीं, ठहरना काम आता है। वहाँ बैठकर शांत होना ही अगली साधना है।
कृष्ण साधक से यह नहीं कहते कि पहले ही दिन चुप बैठ जाओ। उनका क्रम साफ़ है — पहले चढ़ो, फिर ठहरो।
पहले चढ़ना, फिर ठहरना
शुरुआत में निष्काम कर्म सीढ़ी है; ऊँचाई पर पहुँचकर शांति ही साधना बन जाती है।
आपकी यात्रा अभी शुरू हुई है
आगे का ज्ञान, ऐप में।
आपने इस अध्याय के पहले 3 श्लोक पढ़े। सभी 47 श्लोक, उनके हिंदी अर्थ और ऑडियो के लिए Divyora गीता ऐप जल्द आ रहा है। नीचे दिए लिंक हमारे अन्य ऐप के हैं।