श्रीभगवान ने कहा — हे पार्थ, मुझमें मन लगाकर और मेरा ही आश्रय लेकर योग का अभ्यास करता हुआ तू मुझे बिना किसी संशय के, पूर्ण रूप से कैसे जानेगा, वह सुन।
छठा अध्याय ध्यान पर पूरा हुआ था। अर्जुन का मन अभी भी उसी शांति में ठहरा है।
कृष्ण अब एक नई बात शुरू करते हैं। वे कहते हैं — मुझे टुकड़ों में नहीं, पूरा जानना है।
जैसे कोई आपको किसी व्यक्ति का नाम बताए, फिर उसका काम, फिर उसका स्वभाव — और एक दिन आप उसके साथ रहकर उसे सच में जान लें।
कृष्ण यही रास्ता दिखाते हैं — पहले मन मुझमें लगे, फिर सहारा मेरा हो, तब जानना अपने आप पूरा होगा।
पूर्ण ज्ञान का वचन
ईश्वर को पूरा जानना पढ़ने से नहीं, मन उसमें लगाने और उसी का सहारा लेने से शुरू होता है।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ २ ॥
मैं तुझे विज्ञान सहित यह ज्ञान पूरा का पूरा कहूँगा, जिसे जान लेने के बाद इस संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।
एक व्यक्ति ने तैरने पर दस किताबें पढ़ी हैं। वह पानी का भार जानता है, हाथ चलाने का ढंग जानता है।
फिर वह पहली बार नदी में उतरता है, और शरीर पानी पर टिक जाता है। उस क्षण जो समझ आता है, वह किसी पन्ने पर नहीं था।
कृष्ण इन दोनों को अलग नाम देते हैं — ज्ञान है जानना, विज्ञान है उसे जीकर पहचानना।
और वे दोनों साथ देने का वचन देते हैं, ताकि अर्जुन को फिर किसी और दरवाज़े पर भटकना न पड़े।
ज्ञान और विज्ञान
ज्ञान बताता है कि ईश्वर क्या है; विज्ञान उसे अपने अनुभव में पहचानना है — कृष्ण दोनों साथ देते हैं।
यततामपि सिद्धानां — प्रयत्न करने वाले सिद्धों में भी
कश्चिन्मां — कोई एक मुझे
वेत्ति — जानता है
तत्त्वतः — तत्त्व से, सच्चे रूप में
हज़ारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और प्रयत्न करने वाले उन सिद्धों में भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से, मेरे सच्चे रूप में जानता है।
किसी बड़े शहर की सुबह देखिए। लाखों लोग उठते हैं — दफ़्तर, दुकान, बच्चों का स्कूल।
उनमें कुछ ही लोग ऐसे हैं जो रुककर पूछते हैं — मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ? और उनमें भी बहुत कम उस प्रश्न के पीछे सचमुच चल पड़ते हैं।
कृष्ण यह गिनती अर्जुन को डराने के लिए नहीं बताते। वे बताते हैं कि जो खोज अर्जुन के हाथ में आई है, वह कितनी दुर्लभ है।
जिसे यह प्यास मिली है, उसके पास पहले ही बहुत कुछ है।
हज़ारों में कोई एक
ईश्वर को सच में जानने वाले बहुत कम हैं — इसलिए यह जिज्ञासा अपने आप में दुर्लभ उपहार है।
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