अर्जुन ने कहा — हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है, और अधिदैव किसे कहा जाता है?
कल्पना कीजिए — दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, और रथ पर एक शिष्य अपने गुरु की ओर मुड़कर एक के बाद एक प्रश्न रख रहा है।
पिछले अध्याय के अंत में कृष्ण ने कुछ बड़े शब्द कहे थे। अर्जुन ने उन्हें सुना, और सुनकर छोड़ा नहीं।
अब वह एक-एक शब्द उठाता है — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव। जैसे कोई बच्चा किसी अनजानी चीज़ को हथेली पर रखकर पूछे — यह क्या है?
जो बात समझ में नहीं आई, उसे वह चुपचाप निगलता नहीं — फिर से पूछता है।
अर्जुन के प्रश्न
अर्जुन कृष्ण के हर गहरे शब्द को पकड़कर पूछता है — अधूरी समझ पर वह रुकता नहीं।
श्लोक 2
अर्जुन
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ २ ॥
हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है, और वह यहाँ किस प्रकार रहता है? और मृत्यु के समय संयमी मन वाले लोग आपको किस प्रकार जान पाते हैं?
प्रश्न पूछते-पूछते अर्जुन का स्वर बदल जाता है। अब वह केवल परिभाषाएँ नहीं माँग रहा।
वह पूछता है — जब जाने का समय आएगा, तब आप कैसे याद आएँगे?
यह प्रश्न हर मनुष्य के भीतर कहीं छिपा रहता है। अर्जुन उसे युद्ध के बीच, सबसे सीधे शब्दों में, कृष्ण के सामने रख देता है।
वह जानता है कि उस क्षण शरीर थका होगा, साँस धीमी होगी, मन बिखरा होगा। तब किसे थामें?
पूरा आठवाँ अध्याय इसी एक प्रश्न का उत्तर है।
अंत समय का प्रश्न
अंतिम क्षण में ईश्वर कैसे याद रहें — यही प्रश्न इस पूरे अध्याय को जन्म देता है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ ३ ॥
भूतभावोद्भवकरः — प्राणियों को उत्पन्न और विकसित करने वाला
विसर्गः — त्याग, सृजन
कर्मसंज्ञितः — कर्म नाम से जाना जाता है
श्रीभगवान ने कहा — जो कभी नष्ट नहीं होता, वह परम अक्षर ब्रह्म है। जीव का अपना स्वरूप अध्यात्म कहलाता है। और जिस त्याग और सृजन से प्राणियों का अस्तित्व उत्पन्न और विकसित होता है, उसे कर्म कहा जाता है।
कृष्ण उत्तर देना शुरू करते हैं, बड़ी शांति से, एक-एक शब्द को खोलते हुए।
पहला — ब्रह्म। वह जो क्षर नहीं होता, जो घटता नहीं, बदलता नहीं, मिटता नहीं। इसीलिए उसे अक्षर कहते हैं।
दूसरा — अध्यात्म। यह कोई दूर की चीज़ नहीं। यह तेरा अपना स्वभाव है, तेरे भीतर बैठा वह 'मैं' जो देखता और जानता है।
तीसरा — कर्म। वह शक्ति जिससे प्राणी जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, और यह संसार चलता रहता है।
अर्जुन के सामने अब नक्शा खुलने लगा है — ऊपर परम सत्य, भीतर अपना स्वरूप, और बीच में चलता हुआ कर्म।
अक्षर ब्रह्म
ब्रह्म वह है जो कभी नहीं मिटता, और अध्यात्म वह है जो तेरे भीतर तेरा अपना स्वरूप है।
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