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सबसे गुप्त विद्या — और वह सबके लिए खुली है।
श्लोक 1
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ १ ॥
śrībhagavānuvāca |
idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣyāmyanasūyave |
jñānaṁ vijñānasahitaṁ yajjñātvā mokṣyase'śubhāt || 1 ||
इदं तु — यह तो
ते — तुझे
गुह्यतमं — सबसे गोपनीय
प्रवक्ष्यामि — मैं कहूँगा
अनसूयवे — दोष न देखने वाले को
ज्ञानं विज्ञानसहितं — अनुभव सहित ज्ञान
यत् ज्ञात्वा — जिसे जानकर
मोक्ष्यसे अशुभात् — अशुभ से मुक्त हो जाएगा
श्रीभगवान ने कहा — तू दोष ढूँढने वाला नहीं है, इसलिए अब मैं तुझे यह सबसे गोपनीय ज्ञान, अनुभव सहित, बताऊँगा। इसे जानकर तू सारे अशुभ से, संसार के दुःख से, मुक्त हो जाएगा।
रथ पर एक क्षण के लिए सब शांत है। कृष्ण थोड़ा झुकते हैं, जैसे कोई बड़ी बात धीमे स्वर में कहनी हो।
वे कारण भी बताते हैं कि यह रहस्य अर्जुन को ही क्यों मिल रहा है — वह सुनते हुए गुरु में दोष नहीं ढूँढता।
हम अक्सर सुनते कम हैं, परखते ज़्यादा हैं। कहने वाले की कोई कमी पकड़ते ही बात हमारे लिए बंद हो जाती है।
जो मन शिकायत छोड़कर सुनता है, उसी के सामने सबसे गहरा रहस्य खुलता है।
सबसे गोपनीय ज्ञान
सबसे गहरी बात वही सुन पाता है जो सुनते समय कहने वाले में दोष नहीं खोजता।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ २ ॥
यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, सब रहस्यों का राजा है। यह परम पवित्र और सर्वोत्तम है, इसका फल प्रत्यक्ष अनुभव में आता है। यह धर्म के अनुकूल है, करने में बहुत सरल है और कभी नष्ट नहीं होता।
सोचिए, कोई कहे कि सबसे ऊँची विद्या सबसे सरल भी है। हम चौंक जाते हैं, क्योंकि हमें लगता है जो ऊँचा है वह कठिन ही होगा।
कृष्ण ठीक उल्टा कहते हैं — इसे करना सुखद है, बहुत सहज है।
किसी प्रिय को याद करना सीखना नहीं पड़ता। हॉस्टल में बैठी बेटी फ़ोन पर माँ की आवाज़ सुनते ही मुस्कुरा देती है। उसे कोई विधि नहीं चाहिए।
प्रेम की यह विद्या वैसी ही है — इसका फल उसी पल भीतर महसूस होता है, किसी अगले जन्म का इंतज़ार नहीं।
विद्याओं का राजा
सबसे ऊँची विद्या सबसे कठिन नहीं होती — प्रेम से भगवान को याद करना सबसे सहज साधना है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ ३ ॥
मृत्युसंसारवर्त्मनि — मृत्यु से भरे संसार के मार्ग में
हे परन्तप, जो मनुष्य इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे पाए बिना ही लौट आते हैं, और जन्म और मृत्यु से भरे इस संसार के मार्ग पर बार-बार चलते रहते हैं।
एक आदमी रोज़ कुएँ तक जाता है, रस्सी डालता है, पर बाल्टी के पानी तक पहुँचने से पहले ही उसे खींच लेता है। उसे भरोसा ही नहीं कि नीचे पानी है।
वह थककर लौटता है और कहता है — यहाँ कुछ नहीं मिलता।
कृष्ण यही बताते हैं। जिसे भरोसा नहीं, वह द्वार तक आकर भी लौट जाता है। और फिर वही गोल रास्ता — जन्म, भाग-दौड़, मृत्यु, फिर जन्म।
श्रद्धा वह रस्सी है जो बाल्टी को पानी तक पहुँचने देती है।
श्रद्धा के बिना लौटना
भरोसे के बिना हम द्वार तक पहुँचकर भी लौट आते हैं — श्रद्धा ही हमें भीतर तक ले जाती है।
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