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श्लोक 1
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ १ ॥
śrībhagavānuvāca |
bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṁ vacaḥ |
yatte'haṁ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā || 1 ||
भूय एव — फिर से
महाबाहो — हे महाबाहो
शृणु — सुन
मे परमं वचः — मेरे परम वचन
यत् ते — जो तुझसे
प्रीयमाणाय — प्रेम रखने वाले (तुझ) को
वक्ष्यामि — कहूँगा
हितकाम्यया — हित की इच्छा से
श्रीभगवान ने कहा — हे महाबाहो, फिर से मेरे परम वचन सुन। तू मुझसे प्रेम करता है और मेरी बातें सुनकर प्रसन्न होता है, इसलिए तेरे हित की इच्छा से मैं तुझसे यह कहूँगा।
कृष्ण अभी-अभी सबसे गोपनीय रहस्य कह चुके हैं। अर्जुन ने कोई नया प्रश्न नहीं पूछा। फिर भी कृष्ण रुकते नहीं।
वे अर्जुन की ओर मुड़ते हैं और कहते हैं — फिर से सुन।
यह किसी शिक्षक का पाठ दोहराना नहीं है। यह वैसा है जैसे कोई मित्र देखे कि सुनने वाले की आँखें चमक रही हैं, और वह बोलता चला जाए।
कृष्ण कारण भी बताते हैं — तू सुनकर प्रसन्न होता है, और मैं तेरा भला चाहता हूँ। इस अध्याय की हर पंक्ति इसी स्नेह से निकली है।
प्रेम से फिर उपदेश
कृष्ण का यह उपदेश किसी प्रश्न का उत्तर नहीं, एक प्रिय मित्र के हित की चाह से उपजा है।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ २ ॥
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣayaḥ |
ahamādirhi devānāṁ maharṣīṇāṁ ca sarvaśaḥ || 2 ||
न मे विदुः — मेरे (विषय में) नहीं जानते
सुरगणाः — देवताओं के समूह
प्रभवम् — प्रकट होने का रहस्य, उत्पत्ति
न महर्षयः — न महर्षि
अहम् आदिः — मैं आदि कारण हूँ
देवानाम् — देवताओं का
महर्षीणाम् च — और महर्षियों का
सर्वशः — सब प्रकार से
मेरे प्रकट होने के रहस्य को न देवताओं के समूह जानते हैं, न बड़े-बड़े महर्षि। क्योंकि मैं ही सब प्रकार से देवताओं का भी आदि कारण हूँ और महर्षियों का भी।
सोचिए — कोई बेटा अपने पिता का जन्म कैसे देख सकता है? जब पिता जन्मे, तब वह था ही नहीं।
कृष्ण यही कहते हैं। देवता स्वर्ग के स्वामी हैं, महर्षि युगों तक ध्यान में बैठे रहे। पर वे सब मेरे बाद आए।
जो बाद में आया, वह अपने से पहले वाले का आरंभ नहीं देख सकता।
इसलिए उन्हें जानने का रास्ता ऊपर चढ़कर नहीं मिलता। वह तब खुलता है जब वे स्वयं अपने बारे में बताते हैं — और यह पूरा अध्याय वही बताना है।
देवों के भी आदि
देवता और महर्षि भी ईश्वर के आरंभ को नहीं जानते, क्योंकि वे स्वयं उसी से निकले हैं।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३ ॥
yo māmajamanādiṁ ca vetti lokamaheśvaram |
asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate || 3 ||
यः — जो
माम् अजम् — मुझ अजन्मे को
अनादिम् — जिसका कोई आरंभ नहीं
वेत्ति — जानता है
लोकमहेश्वरम् — सब लोकों का महान ईश्वर
असम्मूढः — मोह से रहित
मर्त्येषु — मरणशील मनुष्यों में
सर्वपापैः प्रमुच्यते — सब पापों से छूट जाता है
जो मुझे अजन्मा, अनादि और सब लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मरणशील मनुष्यों के बीच रहकर भी मोह से रहित है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।
एक मनुष्य की कल्पना कीजिए — जिसका जन्म हुआ, जो बूढ़ा होगा, जो एक दिन चला जाएगा।
और वह एक ऐसे को पहचान लेता है जो कभी जन्मा ही नहीं, जिसका कोई आरंभ ही नहीं।
कृष्ण कहते हैं — मरने वालों के बीच रहकर भी वह मोह में नहीं है।
उसकी दृष्टि बदल जाती है। अब वह हर बात को उस अजन्मे के सामने रखकर देखता है, और यही देखना भीतर का मैल धोने लगता है।
जानना यहाँ किताब का ज्ञान नहीं, पहचानना है।
अजन्मा, अनादि ईश्वर
जो ईश्वर को अजन्मा और सबका स्वामी पहचान लेता है, वह मरणशील होकर भी मोह से छूट जाता है।
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