अर्जुन ने कहा — हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हे केशी दैत्य का वध करने वाले! मैं संन्यास का तत्त्व और त्याग का तत्त्व — दोनों को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
सत्रह अध्याय सुन लेने के बाद अर्जुन के मन में दो शब्द बचे रह गए हैं — संन्यास और त्याग।
दोनों का अर्थ 'छोड़ना' लगता है। पर क्या छोड़ना? घर? कर्म? या कुछ और?
अर्जुन साफ़ कहता है — मुझे दोनों को अलग-अलग समझाइए। जो प्रश्न सबसे अंत में आता है, वही अक्सर सबसे गहरा होता है।
इसी एक प्रश्न से गीता का सबसे लंबा और सबसे समेटने वाला अध्याय शुरू होता है।
संन्यास और त्याग का भेद
छोड़ने के दो रूप हैं — बाहर से छोड़ना और भीतर से छोड़ना; अर्जुन यही भेद जानना चाहता है।
श्रीभगवान ने कहा — ज्ञानी जन कामना से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ देने को संन्यास कहते हैं, और विवेकी पुरुष सभी कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
कृष्ण दो रेखाएँ खींचते हैं।
पहली — संन्यास। वे कर्म छोड़ देना जो केवल किसी इच्छा को पूरा करने के लिए किए जाते हैं। जैसे कोई कहे, अब मैं नाम और धन के लिए दौड़ना बंद करता हूँ।
दूसरी — त्याग। कर्म तो सारे करते रहना, पर उनके फल पर अपनी पकड़ छोड़ देना।
एक में हाथ से काम छूटता है, दूसरे में मुट्ठी से फल। कृष्ण का झुकाव किस ओर है, यह आगे के श्लोक बताएँगे।
दो प्रकार का छोड़ना
संन्यास कामना वाले कर्म छोड़ना है, और त्याग हर कर्म के फल की पकड़ छोड़ना है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥ ३ ॥
कुछ विचारशील लोग कहते हैं कि कर्म दोष के समान है, इसलिए छोड़ देना चाहिए। और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए।
कृष्ण पहले दोनों पक्षों की बात सामने रखते हैं, जैसे कोई अच्छा न्यायाधीश करता है।
एक पक्ष कहता है — हर कर्म में कुछ न कुछ दोष है। कहीं कोई कीड़ा कुचलता है, कहीं किसी का मन दुखता है। इसलिए सब छोड़ो।
दूसरा पक्ष कहता है — नहीं, कुछ कर्म ऐसे हैं जो मनुष्य को ऊपर उठाते हैं। यज्ञ, दान, तप।
कृष्ण किसी को गलत ठहराने से पहले दोनों को पूरा सुनते हैं। निर्णय अगले श्लोक में आता है।
दो मतों का विचार
एक मत कहता है सब कर्म छोड़ो, दूसरा कहता है यज्ञ, दान और तप कभी मत छोड़ो।
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