प्रथम 3 श्लोक की मुफ्त झलक · पूरा अध्याय आने वाले ऐप में
आपकी श्रद्धा जैसी है — आप वैसे ही हैं।
श्लोक 1
अर्जुन
अर्जुन उवाच।
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ १ ॥
arjuna uvāca |
ye śāstravidhimutsṛjya yajante śraddhayā'nvitāḥ |
teṣāṁ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāho rajastamaḥ || 1 ||
ये — जो
शास्त्रविधिम् — शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य — छोड़कर
यजन्ते — पूजा करते हैं
श्रद्धया अन्विताः — श्रद्धा से युक्त
तेषाम् निष्ठा — उनकी निष्ठा
का — कैसी
सत्त्वम् आहो रजः तमः — सत्त्व, रज या तम
अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण, जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर, पर श्रद्धा से भरकर पूजा करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है? वह सात्त्विक है, राजसी है या तामसी?
कल्पना कीजिए — एक बूढ़ी माँ, जिसने कभी कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा, रोज़ सुबह तुलसी के आगे दीया रखती है। न मंत्र जानती है, न विधि। बस मन भरा हुआ है।
अर्जुन का प्रश्न ठीक यहीं से उठता है। पिछले अध्याय में कृष्ण ने शास्त्र को मार्गदर्शक कहा था। अब अर्जुन पूछता है — जो नियम नहीं जानते पर श्रद्धा पूरी रखते हैं, उनका क्या?
नियम छूट गए हों पर मन सच्चा हो, तो वह पूजा कहाँ खड़ी होती है?
यह प्रश्न तर्क का कम, करुणा का अधिक है। और इसी प्रश्न पर पूरा अध्याय खुलता है।
अर्जुन का प्रश्न
श्रद्धा और विधि अलग-अलग दिशा में चलें तो किसे तौलें — यही प्रश्न इस अध्याय का द्वार है।
श्रीभगवान ने कहा — देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव से उत्पन्न होती है और वह तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे तू मुझसे सुन।
कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देते। वे पहले उसकी ज़मीन बदलते हैं।
श्रद्धा कोई ऐसी चीज़ नहीं जो बाहर से ओढ़ी जाए। वह भीतर के स्वभाव से उगती है, जैसे मिट्टी से पौधा उगता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि श्रद्धा है या नहीं — प्रश्न यह है कि वह किस रंग की है।
हर जीवित व्यक्ति किसी न किसी चीज़ पर भरोसा करके ही सुबह उठता है। कृष्ण उस भरोसे के तीन नाम रखते हैं — सात्त्विकी, राजसी, तामसी। और कहते हैं — सुन।
श्रद्धा के तीन रंग
श्रद्धा से कोई खाली नहीं होता; फ़र्क़ केवल इतना है कि वह किस स्वभाव से उगी है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ ३ ॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayo'yaṁ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ || 3 ||
सत्त्वानुरूपा — अंतःकरण के अनुरूप
सर्वस्य — सबकी
श्रद्धा भवति — श्रद्धा होती है
भारत — हे भारत
श्रद्धामयः — श्रद्धा से बना हुआ
अयम् पुरुषः — यह मनुष्य
यः यच्छ्रद्धः — जो जैसी श्रद्धा वाला है
सः एव सः — वह वैसा ही है
हे भारत, सबकी श्रद्धा उनके अंतःकरण के स्वभाव के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है — जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह स्वयं भी ठीक वैसा ही है।
यह गीता के सबसे सीधे वाक्यों में से एक है — जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही।
देखिए, हम जिस पर भरोसा करते हैं, उसी की ओर रोज़ झुकते हैं। कोई धन पर टिका है, कोई लोगों की राय पर, कोई किसी गहरे सत्य पर। वही झुकाव धीरे-धीरे चाल, बोली और चुनाव बन जाता है।
तू जिस पर भरोसा करता है, वही धीरे-धीरे तेरा आकार बन जाता है।
कृष्ण यहाँ कोई फ़ैसला नहीं सुनाते। वे एक दर्पण सामने रख देते हैं — अपनी श्रद्धा देख लो, अपना स्वरूप दिख जाएगा।
जैसी श्रद्धा, वैसा मनुष्य
मनुष्य श्रद्धा से बना है — वह जिस पर भरोसा करता है, वही उसका स्वरूप बन जाता है।
आपकी यात्रा अभी शुरू हुई है
आगे का ज्ञान, ऐप में।
आपने इस अध्याय के पहले 3 श्लोक पढ़े। सभी 28 श्लोक, उनके हिंदी अर्थ और ऑडियो के लिए Divyora गीता ऐप जल्द आ रहा है। नीचे दिए लिंक हमारे अन्य ऐप के हैं।