ॐDIVYORATHE BHAGAVAD GITA

अध्याय 16 / 18

दैवासुर सम्पद् विभाग योग

दैवासुरसम्पद्विभागयोग — दैवी और आसुरी स्वभाव

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दैवी और आसुरी — मनुष्य के भीतर दो प्रकृतियाँ।

श्लोक 1

श्रीकृष्ण

श्रीभगवानुवाच। अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca | abhayaṁ sattvasaṁśuddhiḥ jñānayogavyavasthitiḥ | dānaṁ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam || 1 ||

  • अभयम् — निर्भयता
  • सत्त्वसंशुद्धिः — अंतःकरण की शुद्धि
  • ज्ञानयोगव्यवस्थितिः — ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति
  • दानम् — दान
  • दमः — इन्द्रियों का संयम
  • यज्ञः — यज्ञ
  • स्वाध्यायः — शास्त्रों का अध्ययन
  • तपः — तप
  • आर्जवम् — सरलता

श्रीभगवान ने कहा — निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रियों का संयम, यज्ञ, शास्त्रों का स्वाध्याय, तप और सरलता — ये दैवी स्वभाव के पहले लक्षण हैं।

कृष्ण इस सूची की शुरुआत किसी बड़े गुण से नहीं, 'अभय' से करते हैं — डर का न होना। सोचिए, हम कितनी बार सच इसलिए नहीं बोलते, दान इसलिए नहीं करते, सीधी बात इसलिए नहीं कहते — क्योंकि भीतर कोई डर बैठा है। जहाँ डर ढीला पड़ता है, वहाँ बाकी गुण अपने आप जगह पाने लगते हैं। और सूची 'आर्जव' पर आकर रुकती है — सरलता। जो भीतर है, वही बाहर। न कोई परदा, न कोई दोहरी चाल।

दैवी गुणों की शुरुआत

दैवी स्वभाव निर्भयता से शुरू होता है और सरलता पर जाकर खिलता है।

श्लोक 2

श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ २ ॥

ahiṁsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam | dayā bhūteṣvaloluptvaṁ mārdavaṁ hrīracāpalam || 2 ||

  • अहिंसा — हिंसा न करना
  • सत्यम् — सत्य
  • अक्रोधः — क्रोध न करना
  • त्यागः — त्याग
  • शान्तिः — शान्ति
  • अपैशुनम् — चुगली न करना
  • दया भूतेषु — सब प्राणियों पर दया
  • अलोलुप्त्वम् — लालच का अभाव
  • मार्दवम् ह्रीः अचापलम् — कोमलता, लज्जा और अचंचलता

हिंसा न करना, सत्य, क्रोध का न होना, त्याग, शान्ति, किसी की चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लालच का अभाव, कोमलता, बुरे काम से लज्जा और चंचलता का न होना — ये भी दैवी स्वभाव के गुण हैं।

इस सूची को धीरे पढ़िए। ये वे गुण हैं जो जीवन के छोटे-छोटे पलों में सबसे ज़्यादा दिखते हैं। किसी की अनुपस्थिति में उसकी बुराई न छेड़ना — यह है 'अपैशुन'। कड़वा सुनकर भी आवाज़ ऊँची न करना — यह है 'अक्रोध'। मन और हाथों का बिना वजह न भटकना — यह है 'अचापल'। इनमें से कोई भी गुण मंच पर नहीं दिखता। ये रसोई में, रास्ते में, बातचीत के बीच दिखते हैं। दैवी स्वभाव कोई चमत्कार नहीं, रोज़ के व्यवहार की कोमलता है।

कोमल व्यवहार

दैवी गुण बड़े मंचों पर नहीं, रोज़ की छोटी बातचीत और व्यवहार में पहचाने जाते हैं।

श्लोक 3

श्रीकृष्ण

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ ३ ॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā | bhavanti sampadaṁ daivīmabhijātasya bhārata || 3 ||

  • तेजः — तेज
  • क्षमा — क्षमा
  • धृतिः — धैर्य
  • शौचम् — पवित्रता
  • अद्रोहः — किसी से वैर न रखना
  • न अतिमानिता — अपने को बहुत बड़ा न मानना
  • सम्पदम् दैवीम् — दैवी सम्पदा
  • अभिजातस्य — लेकर जन्मे व्यक्ति के
  • भारत — हे भारत

तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर और भीतर की पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अपने को बहुत बड़ा न मानना — हे भारत, ये सब गुण उस व्यक्ति में होते हैं जो दैवी सम्पदा लेकर जन्मा है।

ध्यान दीजिए — इस सूची में 'तेज' और 'क्षमा' साथ-साथ खड़े हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि कोमल होना यानी कमज़ोर होना। कृष्ण ऐसा नहीं मानते। उनके दैवी स्वभाव में आग भी है और क्षमा भी। क्षमा वही कर सकता है जिसमें तेज हो — वरना वह क्षमा नहीं, केवल मजबूरी है। और अंत में 'नातिमानिता' — अपने को ज़रूरत से बड़ा न मानना। जो सबसे आगे खड़ा हो और फिर भी यह न जताए, उसी में ये गुण पूरे होते हैं।

तेज और क्षमा

सच्ची कोमलता कमज़ोरी नहीं — तेज और क्षमा जब साथ हों, तभी दैवी स्वभाव पूरा होता है।

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