ॐDIVYORATHE BHAGAVAD GITA

अध्याय 15 / 18

पुरुषोत्तम योग

पुरुषोत्तमयोग — परम पुरुष

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संसार एक उल्टा वृक्ष है — इसे काटकर आगे बढ़िए।

श्लोक 1

श्रीकृष्ण

श्रीभगवानुवाच। ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca | ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṁ prāhuravyayam | chandāṁsi yasya parṇāni yastaṁ veda sa vedavit || 1 ||

  • ऊर्ध्वमूलम् — ऊपर की ओर जड़ वाला
  • अधःशाखम् — नीचे की ओर शाखाओं वाला
  • अश्वत्थम् — पीपल का वृक्ष
  • प्राहुः — कहते हैं
  • अव्ययम् — अविनाशी
  • छन्दांसि — वेद के मंत्र
  • यस्य पर्णानि — जिसके पत्ते
  • यः तम् वेद — जो उसे जानता है
  • सः वेदवित् — वह वेदों का ज्ञाता

श्रीकृष्ण ने कहा — इस संसार को एक ऐसा अविनाशी पीपल का वृक्ष कहा गया है जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। वेद के मंत्र इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को ठीक-ठीक जानता है, वही सच में वेदों को जानता है।

कल्पना कीजिए — एक विशाल पीपल का पेड़, पर उल्टा। उसकी जड़ें ऊपर आकाश में हैं और शाखाएँ नीचे धरती की ओर झुकी हैं। कृष्ण संसार को ऐसे ही दिखाते हैं। इसका स्रोत ऊपर है, परमात्मा में। इसका फैलाव नीचे है, हमारी दुनिया में। हम शाखाओं के बीच जीते हैं, इसलिए जड़ दिखाई नहीं देती। वेद इसके पत्ते हैं — वे इस पेड़ को हरा रखते हैं, छाया देते हैं। पर पत्ते गिनने वाला वेदवित् नहीं कहलाता। वेदवित् वह है जो पत्तों से होकर जड़ तक पहुँचे।

उल्टा पीपल का वृक्ष

संसार की जड़ ऊपर परमात्मा में है; जो यह देख ले, उसने वेदों का सार पा लिया।

श्लोक 2

श्रीकृष्ण

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥ २ ॥

adhaścordhvaṁ prasṛtāstasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ | adhaśca mūlānyanusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke || 2 ||

  • अधः च ऊर्ध्वम् — नीचे और ऊपर
  • प्रसृताः — फैली हुई
  • तस्य शाखाः — उसकी शाखाएँ
  • गुणप्रवृद्धाः — गुणों से पोषित
  • विषयप्रवालाः — विषय रूपी कोंपलों वाली
  • अधः च मूलानि — और नीचे जड़ें
  • अनुसन्ततानि — फैलती जाती हैं
  • कर्मानुबन्धीनि — कर्मों से बाँधने वाली
  • मनुष्यलोके — मनुष्य लोक में

उस वृक्ष की शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं। तीनों गुण उन्हें पोषते हैं और इंद्रियों के विषय उसकी कोंपलें हैं। उसकी जड़ें नीचे मनुष्य लोक में भी फैलती जाती हैं, जो जीव को कर्मों से बाँध देती हैं।

अब कृष्ण पेड़ के और पास ले चलते हैं। शाखाएँ केवल नीचे नहीं, ऊपर भी जाती हैं — कोई जीव ऊँचे लोकों में है, कोई नीचे। इन शाखाओं को सत्त्व, रज और तम सींचते हैं। और हर शाखा पर नई कोंपलें फूटती हैं — एक सुंदर रूप, एक मीठा स्वाद, एक मधुर आवाज़। कोंपल देखकर मन उस ओर खिंचता है, और हर खिंचाव एक नई जड़ बन जाता है। ये नीचे की जड़ें ही मनुष्य को एक कर्म से दूसरे कर्म में बाँधती चली जाती हैं।

विषयों की कोंपलें

हर आकर्षण एक छोटी जड़ है; इन्हीं जड़ों से संसार का वृक्ष हमें पकड़े रहता है।

श्लोक 3

श्रीकृष्ण

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥

na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca saṁpratiṣṭhā | aśvatthamenaṁ suvirūḍhamūla masaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā || 3 ||

  • न रूपम् अस्य — इसका रूप नहीं
  • इह तथा उपलभ्यते — यहाँ वैसा दिखाई देता
  • न अन्तः न च आदिः — न अंत, न आरंभ
  • न च संप्रतिष्ठा — न ही आधार
  • अश्वत्थम् एनम् — इस पीपल को
  • सुविरूढमूलम् — गहरी जड़ों वाले
  • असङ्गशस्त्रेण — असंग रूपी शस्त्र से
  • दृढेन — दृढ़
  • छित्त्वा — काटकर

इस संसार में इस वृक्ष का असली रूप वैसा दिखाई नहीं देता। न इसका अंत मिलता है, न आरंभ, न ही इसका आधार। इस गहरी जड़ों वाले पीपल को असंग यानी वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से काट देना चाहिए।

कल्पना कीजिए — आप घने जंगल के बीच खड़े हैं। चारों ओर पेड़ ही पेड़। कहाँ से शुरू हुआ, कहाँ ख़त्म होगा, कुछ पता नहीं। संसार के भीतर खड़े होकर संसार का नक्शा नहीं दिखता। इसलिए कृष्ण इसे पूरा समझाने से ज़्यादा काटने की बात करते हैं। और हथियार भी बताते हैं — असंग, यानी न चिपकना। यह कुल्हाड़ा कमज़ोर हो तो कटी जड़ें फिर हरी हो जाती हैं। इसीलिए कृष्ण कहते हैं — दृढ़। एक दिन का वैराग्य नहीं, टिका हुआ वैराग्य।

वैराग्य का कुल्हाड़ा

संसार की उलझन को पूरा समझना ज़रूरी नहीं; उससे चिपकना छोड़ देना ही उसकी जड़ काटना है।

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