ज्ञानानाम् ज्ञानम् उत्तमम् — ज्ञानों में उत्तम ज्ञान
यत् ज्ञात्वा — जिसे जानकर
मुनयः सर्वे — सभी मुनि
पराम् सिद्धिम् — परम सिद्धि को
इतः गताः — यहाँ से प्राप्त हुए
श्रीभगवान ने कहा — मैं तुझे फिर से वह परम ज्ञान बताऊँगा जो सब ज्ञानों में उत्तम है, जिसे जानकर सभी मुनि इस संसार से परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
कोई अच्छा शिक्षक एक बात दोबारा तभी कहता है, जब वह सबसे ज़रूरी हो। कृष्ण यहाँ 'फिर से' कहते हैं।
पिछले अध्याय में उन्होंने शरीर और उसे जानने वाले को अलग करके दिखाया था। पर एक प्रश्न बाकी था — जो जानने वाला मुक्त है, वह इस शरीर में उलझता क्यों है?
अब कृष्ण उसी उलझन की गाँठ खोलने बैठे हैं। वे इसे ज्ञानों में उत्तम कहते हैं, क्योंकि यह केवल जानकारी नहीं, अपनी पहचान है।
जिस गाँठ को पहचान लिया, उसे खोलना आधा काम है।
ज्ञानों में उत्तम ज्ञान
जो ज्ञान हमें अपनी उलझन की जड़ दिखा दे, वही सब ज्ञानों में उत्तम है।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ २ ॥
idaṁ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ |
sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca || 2 ||
इदम् ज्ञानम् — इस ज्ञान का
उपाश्रित्य — आश्रय लेकर
मम साधर्म्यम् — मेरे समान स्वरूप को
आगताः — प्राप्त हुए
सर्गे अपि — सृष्टि के समय भी
न उपजायन्ते — जन्म नहीं लेते
प्रलये — प्रलय में
न व्यथन्ति — व्याकुल नहीं होते
इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे समान स्वरूप को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के आरम्भ में फिर जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय व्याकुल नहीं होते।
बाढ़ आने पर नदी किनारे बसे गाँव डरते हैं। पर जो पहाड़ी पर रहता है, वह पानी को चढ़ते-उतरते देखता है और चैन से सोता है।
कृष्ण ऐसे ही लोगों की बात करते हैं। संसार बनता है, बिखरता है; सृष्टि आती है, प्रलय आता है। पर जिसने इस ज्ञान का सहारा ले लिया, वह इस धारा में नहीं बहता।
'मेरे समान स्वरूप' यानी कृष्ण जैसी स्थिरता, जो बदलते दृश्य के बीच भी नहीं डगमगाती।
वह पानी से भागा नहीं है। बस ऊँची जगह पर खड़ा है।
उतार-चढ़ाव से ऊपर
यह ज्ञान संसार को नहीं रोकता, पर हमें उसकी बाढ़ से ऊपर खड़ा कर देता है।
mama yonirmahadbrahma tasmin garbhaṁ dadhāmyaham |
saṁbhavaḥ sarvabhūtānāṁ tato bhavati bhārata || 3 ||
मम योनिः — मेरा गर्भस्थान
महत् ब्रह्म — महान प्रकृति
तस्मिन् — उसमें
गर्भम् दधामि अहम् — मैं गर्भ स्थापित करता हूँ
सम्भवः — उत्पत्ति
सर्वभूतानाम् — सब प्राणियों की
ततः भवति — उसी से होती है
भारत — हे भारत
हे भारत, यह महान प्रकृति मेरा गर्भस्थान है। उसमें मैं चेतना का बीज स्थापित करता हूँ, और उसी से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
किसान खेत में बीज डालता है। मिट्टी उसे अपने भीतर रखती है, नमी देती है, आकार देती है। पर बीज मिट्टी का नहीं, किसान का है।
कृष्ण सृष्टि को ऐसे ही समझाते हैं। प्रकृति वह विशाल खेत है — मिट्टी, पानी, हवा, शरीर बनाने वाला सारा पदार्थ। उसमें जीवन का बीज कृष्ण रखते हैं।
इसलिए हर प्राणी में दो चीज़ें मिली हुई हैं — प्रकृति से बना शरीर, और कृष्ण से आई चेतना।
आगे के सारे श्लोक इसी मेल को समझने की कुंजी हैं।
प्रकृति में चेतना का बीज
हर जीव में शरीर प्रकृति का है और चेतना परमात्मा की; दोनों का मेल ही जीवन है।
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