ॐDIVYORATHE BHAGAVAD GITA

अध्याय 13 / 18

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग — शरीर और आत्मा

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शरीर क्षेत्र है — और जानने वाला क्षेत्रज्ञ।

श्लोक 1

श्रीकृष्ण

श्रीभगवानुवाच। इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ १ ॥

śrībhagavānuvāca | idaṁ śarīraṁ kaunteya kṣetramityabhidhīyate | etadyo vetti taṁ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ || 1 ||

  • इदम् शरीरम् — यह शरीर
  • कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र
  • क्षेत्रम् इति — क्षेत्र यानी खेत
  • अभिधीयते — कहा जाता है
  • एतत् यः वेत्ति — इसे जो जानता है
  • तम् प्राहुः — उसे कहते हैं
  • क्षेत्रज्ञः इति — खेत को जानने वाला
  • तद्विदः — तत्त्व को जानने वाले

श्रीभगवान ने कहा — हे कौन्तेय, यह शरीर 'क्षेत्र' यानी खेत कहलाता है। और जो इस शरीर को जानता है, उसे तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी 'क्षेत्रज्ञ' — अर्थात खेत को जानने वाला — कहते हैं।

रथ पर कृष्ण अपनी ही छाती पर हाथ रखते हैं और कहते हैं — यह एक खेत है। अर्जुन चौंकता है। खेत? जिसमें बीज पड़ते हैं, फ़सल उगती है, मौसम बदलते हैं? हाँ, ठीक वैसा ही। इस शरीर में भी हर दिन कुछ बोया जाता है और कुछ काटा जाता है। भूख उगती है, थकान उगती है, गुस्सा उगता है। पर ध्यान रहे। जो यह सब होते हुए देख रहा है, वह खेत नहीं है। वह खेत का जानकार है।

शरीर एक खेत

शरीर वह खेत है जिसमें सब कुछ उगता और मुरझाता है; जो इसे देखता है, वह खेत से अलग है।

श्लोक 2

श्रीकृष्ण

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ २ ॥

kṣetrajñaṁ cāpi māṁ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata | kṣetrakṣetrajñayorjñānaṁ yattajjñānaṁ mataṁ mama || 2 ||

  • क्षेत्रज्ञम् — खेत को जानने वाला
  • च अपि — और भी
  • माम् विद्धि — मुझे ही जान
  • सर्वक्षेत्रेषु — सब क्षेत्रों में
  • भारत — हे भारत
  • क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः — क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का
  • ज्ञानम् यत् — जो ज्ञान है
  • तत् ज्ञानम् — वही ज्ञान है
  • मतम् मम — मेरा मत

हे भारत, सब क्षेत्रों में जो क्षेत्रज्ञ है, उसे भी तू मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ठीक-ठीक ज्ञान है, वही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।

कृष्ण बात को एक कदम आगे ले जाते हैं। हर शरीर में एक जानने वाला है — और हर जानने वाले के भीतर मैं भी हूँ। सोचिए, एक बड़े अस्पताल में सैकड़ों मरीज़ हैं। हर बिस्तर पर एक अलग शरीर, एक अलग दर्द। पर हर कमरे की बत्ती एक ही बिजलीघर से जलती है। कृष्ण कहते हैं — ज्ञान का अर्थ किताबें रट लेना नहीं। ज्ञान है यह पहचानना कि क्या बदलता है और कौन देखता है। बाकी सब केवल जानकारी है।

हर खेत में वही

असली ज्ञान वही है जो बदलने वाले शरीर और उसे जानने वाले को अलग-अलग पहचान ले।

श्लोक 3

श्रीकृष्ण

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥ ३ ॥

tatkṣetraṁ yacca yādṛk ca yadvikāri yataśca yat | sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu || 3 ||

  • तत् क्षेत्रम् — वह क्षेत्र
  • यत् च यादृक् च — जो है और जैसा है
  • यद्विकारि — जिन विकारों वाला
  • यतः च यत् — जिससे जो उत्पन्न हुआ
  • सः च यः — और वह क्षेत्रज्ञ जो है
  • यत्प्रभावः च — और जिस प्रभाव वाला
  • समासेन — संक्षेप में
  • मे शृणु — मुझसे सुन

वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें कौन-से विकार होते हैं और वह किस कारण से किससे उत्पन्न हुआ है; और वह क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है — यह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

कृष्ण अब एक सूची बनाते हैं, जैसे कोई अच्छा अध्यापक बोर्ड पर पहले शीर्षक लिख दे। खेत क्या है। वह कैसा है। उसमें क्या-क्या बदलता है। वह कहाँ से आया। और फिर दूसरी ओर — जानने वाला कौन है, और उसकी शक्ति क्या है। अर्जुन के सामने अब कोई धुँधला उपदेश नहीं, एक साफ़ नक्शा है। वह सँभलकर बैठ जाता है, क्योंकि उसे पता है कि जो आने वाला है, वह थोड़े शब्दों में बहुत कुछ होगा।

संक्षेप में सुन

कृष्ण उलझे प्रश्न को छोटे, साफ़ सवालों में बाँट देते हैं — खेत क्या है, और जानने वाला कौन।

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