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भगवान को सबसे प्रिय भक्त कौन है।
श्लोक 1
अर्जुन
अर्जुन उवाच।
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ १ ॥
arjuna uvāca |
evaṁ satatayuktā ye bhaktāstvāṁ paryupāsate |
yecāpyakṣaramavyaktaṁ teṣāṁ ke yogavittamāḥ || 1 ||
एवम् — इस प्रकार
सततयुक्ताः — निरंतर जुड़े हुए
ये भक्ताः — जो भक्त
त्वाम् पर्युपासते — आपकी उपासना करते हैं
ये च अपि — और जो
अक्षरम् — अविनाशी
अव्यक्तम् — अव्यक्त, निराकार
तेषाम् के योगवित्तमाः — उनमें योग को सबसे उत्तम जानने वाले कौन हैं
अर्जुन ने कहा — जो भक्त इस प्रकार निरंतर आपसे जुड़े रहकर आपकी उपासना करते हैं, और जो अविनाशी, अव्यक्त निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं — इन दोनों में योग को सबसे उत्तम जानने वाले कौन हैं?
कल्पना कीजिए — दो साधक। एक सुबह मंदिर में दीया जलाता है, कृष्ण की मूर्ति से बातें करता है, उन्हें भोग लगाता है।
दूसरा आँखें बंद करके बैठता है। न कोई रूप, न कोई नाम। बस उस अनंत का ध्यान, जिसकी कोई सीमा नहीं।
अर्जुन ने अभी-अभी विराट रूप देखा है, और अब उसके मन में एक ईमानदार उलझन है। किसका रास्ता अधिक पूर्ण है?
यह प्रश्न आज भी हर घर में पूछा जाता है — मूर्ति या ध्यान, नाम या मौन?
अर्जुन यह प्रश्न हम सबकी ओर से पूछ रहा है।
अर्जुन का प्रश्न
भगवान को रूप में भजें या निराकार में — यह प्रश्न ईमानदारी से पूछना भी साधना का पहला कदम है।
श्लोक 2
श्रीकृष्ण
श्रीभगवानुवाच।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ २ ॥
śrībhagavānuvāca |
mayyāveśya mano ye māṁ nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetāste me yuktatamā matāḥ || 2 ||
मयि — मुझमें
आवेश्य मनः — मन को लगाकर
ये माम् — जो मुझे
नित्ययुक्ताः — सदा जुड़े हुए
उपासते — भजते हैं
श्रद्धया परया उपेताः — परम श्रद्धा से युक्त
ते मे युक्ततमाः मताः — वे मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी हैं
श्रीभगवान ने कहा — जो मुझमें मन को लगाकर, सदा मुझसे जुड़े रहकर, परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योगियों में सबसे श्रेष्ठ मानता हूँ।
कल्पना कीजिए — एक माँ, जिसका बेटा दूसरे शहर में पढ़ता है। वह सब्ज़ी काटती है, दफ़्तर जाती है, पड़ोसन से बातें करती है — पर मन का एक कोना हर पल बेटे के पास रहता है।
कोई उसे यह करना नहीं सिखाता। प्रेम अपने आप मन को वहीं ले जाता है।
कृष्ण के शब्द हैं 'मय्यावेश्य मनः' — मन को मुझमें पूरी तरह उतार देना। उनका उत्तर सीधा है: जिसका मन प्रेम और श्रद्धा से मुझमें टिका है, वही सबसे ऊँचा योगी है।
यहाँ योग कोई कठिन आसन नहीं, एक रिश्ता है।
प्रेम से जुड़ा मन
सबसे ऊँचा योगी वह है जिसका मन प्रेम और श्रद्धा से भगवान में लगा रहता है।
श्लोक 3
श्रीकृष्ण
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥ ३ ॥
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṁ paryupāsate |
sarvatragamacintyaṁ ca kūṭasthamacalaṁ dhruvam || 3 ||
ये तु — परंतु जो
अक्षरम् — अविनाशी
अनिर्देश्यम् — जिसका वर्णन न हो सके
अव्यक्तम् — अव्यक्त
पर्युपासते — उपासना करते हैं
सर्वत्रगम् — सर्वव्यापी
अचिन्त्यम् — सोच से परे
कूटस्थम् — कभी न बदलने वाला
अचलम् ध्रुवम् — अचल और नित्य
परंतु जो लोग उस अविनाशी ब्रह्म की उपासना करते हैं, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं हो सकता, जो अव्यक्त है, सब जगह व्याप्त है, चिंतन से परे है, कूटस्थ है — कभी नहीं बदलता — और जो अचल तथा नित्य है…
कल्पना कीजिए — आकाश को पकड़ने की कोशिश। वह हर जगह है, आपकी मुट्ठी में भी, फिर भी मुट्ठी खोलो तो कुछ नहीं।
कृष्ण निराकार का वर्णन करते हुए विशेषणों की एक लंबी कतार लगा देते हैं — अनिर्देश्य, अव्यक्त, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव।
ध्यान दीजिए, लगभग हर शब्द एक 'नहीं' है। जिसे बताया नहीं जा सकता। जिसे देखा नहीं जा सकता। जिसे सोचा नहीं जा सकता।
मन को टिकने के लिए कोई किनारा चाहिए। यहाँ कोई किनारा नहीं।
यह मार्ग झूठा नहीं है — बस खुले आकाश में बिना सहारे चलने जैसा है।
जिसका कोई रूप नहीं
निराकार सत्य हर जगह है, पर मन के पास उसे थामने के लिए कोई रूप, कोई नाम नहीं होता।
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